Wednesday, 18 March 2015

जुगनुओं के शहर से एक और ख़त

जुगनुओं के शहर से एक और ख़त

                जुगनुओं के शहर से एक और ख़त

इक अजनबी है अजनबी शहर को आ गया
होटल जो लौटा तो लगा कि घर को आ गयातन्हाई से मिलना हुआ कितने बरस के बाद
कमबख्त को करते रहे कितना तरस के याद
कितने ये चेहरे ओढ़ के दिल्ली में खो गयी
ख़त लिक्खे, पुकारा किये, खामोश हो गयी
इक छोटे से शहर में है शरमा के फिर मिली
“कैसे हो अजनबी?” है ये फरमा के फिर मिली
मैं क्या बताऊँ तुमको कि मैं कैसा हूँ क्या हूँ
तुम छोड़ गयीं मुझको मैं वहीँ पे खड़ा हूँ
इक याद का टुकडा मेरे घर भूल आई थीं
मैं आज ढूँढता उसी मंज़र को आ गया
होटल जो लौटा तो लगा कि घर को आ गया …

Tuesday, 17 March 2015

हमारे मन के कमरे में....

हमारे मन के कमरे में


हमारे मन के कमरे में,
यूँ इक मंज़र अनोखा हो
हवा की तेज़ लहरें हों, 
कहीं पानी का झोंका हो 
और इक लम्हे की कश्ती पे, 
कुछ इस तरहा तू बैठी हो 
वही मेरी हकीकत हो, 
वही नज़रों का धोखा हो 
हमारे मन के कमरे में, 
यूँ इक मंज़र अनोखा हो …



मैं अक्सर सोचता हूँ …

मैं अक्सर सोचता हूँ …

मैं अक्सर सोचता हूँ
क्या वो मुझको सोचता होगा?
पलट के देखता हूँ
क्या वो मुझको देखता होगा?
मैं अक्सर सोचता हूँ
इत्तेफकान मुझसे मिलने को
कहीं ख्वाबों के रस्तों पे
संदेसे फेंकता होगा?
मैं अक्सर सोचता हूँ
क्यूँ मैं उसकी राह को देखूं
जहाँ छोड़ा था उसको
वो वहां से चल पड़ा होगाeeee
मैं अक्सर सोचता हूँ
सच नहीं है, झूठ ही होगा
वो जैसा दुनिया कहती है
क्या उतना ही बुरा होगा?
मैं अक्सर सोचता हूँ
ये जो मेरे दिल का नश्तर है
है जिसकी उँगलियाँ थामें
क्या उसको भी चुभा होगा?